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जूही की कली सी याद तुम्हारी जब भी खुशबू फैलाती
भूल के सब कुछ श्याम तुम्हारी राधा सुध-बुध बिसराती
प्रेम बेल जवाँ हुई जब से बावरी सी वन-वन डोले
श्याम तुम्हारी धुन वंशी की हवा में अब सर-सर बोले
दो किनारे अब हम दोनों याद की यमुना लहराती
जूही की कली सी याद तुम्हारी जब भी खुशबू फैलाती
खेल-खेल में रोग ये पाला लगते दुश्मन जो समझाते
संयोग संग विरह भी होगा श्याम कभी न बतलाते
पल-पल का था साथ हमारा अब तन्हाई दहलाती
जूही की कली सी याद तुम्हारी जब भी खुशबू फैलाती
बांसुरी तक सौतन लगती थी तन-मन तुझपे वारा था
तेरी चितवन से ओ कान्हा वृन्दावन तक हारा था
प्रेम की बस इक भाषा जानूँ उद्धव को वो ही समझाती
जूही की कली सी याद तुम्हारी जब भी खुशबू फैलाती
रोक सकी न मैं ही तुमको सखियाँ देतीं हैं ताना
प्रीत में कैसी भूल हुई जो छोड़ गये तुम बतलाना
बावरी सी मैं नाम तुम्हारा कृष्णा-कृष्णा दोहराती
जूही की कली सी याद तुम्हारी जब भी खुशबू
फैलाती
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