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सावन उनसे जाके कहना रे (गीत)


 

  सावन उनसे जाके कहना रे
सावन उनसे जाके कहना रे
इस मौसम में भी उनके बिन कैसा रहना रे
सावन उनसे जाके कहना रे
उनके बिन भी कैसा रहना रे
मन तो मन है देख के बादल चहक उठा, मचल गया
पर बादल यूं बरसा मुझको छोड़ के प्यासी निकल गया
हर बारिश ने अगन लगाई अब न दहना रे
सावन उनसे जाके कहना रे
बाहों के झूलों में झूलूं, झोंटें दें उनकी बतियाँ
गुलमोहर सी खिली शाम हो रजनीगंधा सी रतियाँ
साथ के चंदन की खुश्बू में संग – संग बहना रे
सावन उनसे जाके कहना रे
उनके बिन भी कैसा रहना रे
दोनों हाथों में हैं कंगन लेकिन उनमें खनक नहीं
बिंदिया है पर चमक नहीं है पायल है पर छमक नहीं
हर गहना – गहना हो जाएं खुद ही पहना रे
सावन उनसे जाके कहना रे
उनके बिन भी कैसा रहना रे
 
     
 
 
 

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