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  रचने वाले कैसे तूने हमको रचाया है

 

 

रचने वाले कैसे तूने हमको रचाया है

माटी गढ़-गढ़ खुद ही बनाया खुद ही मिटाया है

 

चाक पे धर के माटी को बनाया है तुमने तन

तन के भीतर फूल सा कोमल सजाया है इक मन

फिर स्वास भरे कितने जतन से कैसी माया है

माटी गढ़-गढ़ खुद ही बनाया खुद ही मिटाया है

 

कठपुतली से नाचते हम, दुनिया के मेले में

कैसे-कैसे खेल दिखाते, जीवन के खेले में

बंज़ारे इस नगरी के हम फिर भी बसाया है

माटी गढ़-गढ़ खुद ही बनाया खुद ही मिटाया है

 

माटी के इस पात्र पे सुख के चढ़ाये हैं रंग

धूप में सबकों पकाया कुछ गम भी दिए संग

प्रेम से कोई पात्र भरा तो कोई रिताया है

माटी गढ़-गढ़ खुद ही बनाया खुद ही मिटाया है

 

जनम-मरण का कैसा सुन्दर उत्सव है मनाया

कोई न जाने कब जगाया कब हमको सुलाया

माटी से रचायी काया माटी में मिलाया है

माटी गढ़-गढ़ खुद ही बनाया खुद ही मिटाया है


 
     
 
 
 

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