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प्रेम


 

 

हे कृष्ण

कहीं राधा

कहीं रुक्मणी

कहीं मीरा

तुम्हारे प्रेम में दीवानी

अमर कहानी बन कर रह गई

ताउम्र आँखों का पानी बन कर रह गई

और तुम गीता-महाभारत रचते रहे

प्रेममार्ग भूल कर ज्ञानमार्ग पर चलते रहे

अर्जुन को जीवन का मर्म बताने वाले भगवन

क्या तुम भूल गये कि जीवन की किताब

में तुमने ही प्रेम का अध्याय लिखा था

उसे ही हाशिये पर रख दिया

ज्ञान से प्रेम को ढक दिया

और वे तुम्हें आज तक पूजती हैं

इसलिए नहीं कि तुम

उनके लिए भगवान हो

बल्कि इसलिए कि औरत अगर किसी

से प्रेम करती है तो उनका प्रेम

स्वयं भगवान बन जाता है

बेशक पत्थर के भगवान

हमेशा की तरह खामोश ही क्यूं न हो।

 
     
 
 
 

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