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मुक्तक पिता


भीतर-भीतर छुप-छुप कर ही रो लेते हैं बाबूजी

अपने दिल की व्यथा-कथा को कब कहते हैं बाबूजी

वृक्ष सरीखे हैं वे अपना फ़र्ज नहीं भूला करते

कड़ी धूप में तप कर भी छाया देते हैं बाबूजी

 

मान और सम्मान भरा था हम सब आदर करते थे

गुस्सा हैं या खुश बाबूजी हम भावों को पढ़ते थे

अब बाबूजी हमको अपने बच्चों से डर लगता हैं

आँख दिखाते हैं ये हमको, हम आँखों से डरते थे


 

मैं भी आँखों में ख्वाब रखती हूँ

अपनी पलकों पे आब रखती हूँ

बिन तेरे कैसे कटा है ये सफ़र

हर थकन का हिसाब रखती हूँ


सबकी आँखों में इक समन्दर है

कितना धुँधला हरेक मन्ज़र है

हँस रहा आदमी बस बाहर से

सच तो कुछ और है जो अन्दर है


गर बदी है तो संग शराफत है

प्यार है तो ही तो शिकायत है

है मुनासिब हँसी वही केवल

आँसुओं की जहाँ हिफाजत है

 

दिल की पुकार दूरियों से कम नहीं होतीं

आँखें यूं बेवज़ह कभी भी नम नहीं होतीं

आते न मेघ की तरह जीवन गगन में तुम

मेरी हृदय धरा पे छमा-छम नहीं होतीं


लोग ऐसे भी मिलते जाते हैं

खास दिल में जगह बनाते हैं

नाम होता नहीं इन रिश्तों का

उम्र भर साथ पर निभाते हैं


 

 

 

 

 

 

     

 
 
 

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