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मुक्तक


 

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मौत सच है मगर ज़िन्दगी देखिए

आग मत देखिए रौशनी देखिए

चाँद को देखना हो अगर आपको

दाग़ मत देखिए चाँदनी देखिए


मन के मरुथल में भी अबकी बरसात हो

हर तरफ़ आग है प्यार की बात हो

भर सके रोशनी ज़िन्दगी में सदा

इस तरह की कोई चाँदनी रात हो


यूं तो जीवन में बस खार ही खार है

फिर भी लगता मुझे इक ये उपहार है

गम मिले सुख मिले चाहे कुछ भी मिले

मेरे दामन में तो प्यार ही प्यार है


तार से तार हम दिल के यूं जोड़ दें

दुश्मनी को भी हम प्यार का मोड़ दें

आज है कल न हो, पल की किसको खबर

जो हुआ सो हुआ, सोचना छोड़ दें


 

लाख गम हो मगर मुस्कुराओ ज़रा

मुस्कुराते सुमन, मुस्कुराती धरा

आदमी बन गया दर्द जिसने जिया

आँच पे तप के ही स्वर्ण होता खरा


प्यास जब मैं बनी बन गये नीर तुम

मैं बनी जब नदी बन गये तीर तुम

दर्द में डुब कर वक्त ने जब लिखा

मैं ग़ज़ल बन गई बन गये मीर तुम


तू गुलाल मेरा, मैं रोली तेरी

तू कहार मेरा, मैं डोली तेरी

तू आंगन मेरा, मैं रंगोली तेरी

तू मेरा फाग है, मैं होली तेरी


भर गया रंग जब मुझमें वो प्यार का

जाने कैसे मैं खुद ही संवरने लगी

एक रंगोली बनी मैं सजी इस कदर

खुद ही फागुन का त्यौहार लगने लगी


     

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