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‘अ’ से अनार
‘आ’ से आम
सिखाने वाली औरत
अपने बेटों को
प्रारंभिक पाठशाला में ही
‘अ’ से अधिकार
‘आ’ से आरक्षण
‘म’ महिलाएँ
और उनकी महत्त्वकाक्षाएँ सीखा कर
अपना भविष्य सुनिश्चित कर सकती हैं
पर
वे केवल ‘म’ से माँ बनी रहती हैं |
और यही बेटे माँ से भाषा सीखने
के उपरान्त भूल जाते हैं कि गर
उनकी माँ ने ‘ बारह खड़ी’ और
‘वर्णमाला’ के एक –एक अक्षर के अर्थ
अपने हक में गढ़े होते
तो ये ही बेटे संसद के गलियारों में नहीं
घर के आँगन या रसोईघर में खड़े होते
किन्तु
माँ बनी औरत
हमेशा से छली जा रही हैं
छली जा रही हैं
आखिर क्यों ? |