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माँ


 

 

माँ

मोम सी जलती रही
ताकि घर रोशन हो सके
और सब उस रोशन घर में बैठे
सुनहरे सपने बुना करते
परियों की कहानियां सुना करते
माँ की तपन से बेखबर
बात-बात से खुशियां चुना करते
और माँ जलती जाती
चुपचाप पिघलती जाती
मुर्गे की बांग से रात के सन्नाटे तक
बाज़ार के सौदे से घर के आटे तक
बापू की चीख से बच्चों की छींक तक
सपनो की दुनिया से घर की लीक तक
माँ खुद को भुलाकर बस माँ होती थी
बिन मांगी एक दुआं होती थी
माँ चक्करघिरनी सी घुमती रही
खुद अनकही पर सबकी सुनती रही
पर जब वह उदास होती
एक बात बड़ी खास होती
वह बापू से दूर-दूर रहती
पर बच्चों के और पास होती
माँ ने खुद खींची थी एक लक्ष्मण रेखा अपने चारो ओर
इसलिए नहीं मांगा कभी सोने का हिरण, कोई चमकती किरण
माँ को चाहिए था वो घर
जहां थे उनके नन्हें-नन्हें पर
जिनमे आसमां भरना था

हर सपना साकार करना था
पर जब सपने उड़ान भरने लगे
दुर्भाग्यवश धरा से ही डरने लगे
और माँ वक्त के थपेड़ों से भक-भक कर जलने लगी
बूढ़ी हो गई वह भीतर से गलने लगी
जिस माँ ने आबाद किया था घर को
वहीं माँ उस घर को खलने लगी
उंगली पकड कर जिनको चलना सिखाया
हर पग पर जिन्हें संभलना सिखाया
जिनका झूठा खाया, लोरी सुनाई
बापू से जिनकी कमियां छिपाई
रात भर सीने से लगा चुप कराती रही
बच्चों का पेट भर हर्षाती रही
दो पाटों के बीच सदा पिसती रही
आँखों से दर्द बनकर रिसती रही
बापू के हज़ार सितम झेलती थी पर
बच्चों के खातिर कुछ ना बोलती थी
ऐसी मोम सी माँ

जलते-जलते बुझ गई

यक्ष प्रश्न कर गई

कि

एक माँ सारे घर को संभाल लेती है

सारा घर मिलकर भी एक माँ को संभाल नहीं पाता

माँ के जीवन की संध्या को ही रोशनी क्यूं नही नसीब होती
जबकि मां अपने बच्चों की हर पहर को रोशन करने के लिए
ताउम्र आंधियों से लड़ा करती है
उनके सहारे की कद्र क्यूं नहीं हुआ करती
जबकि जब वह दूर चली जाती है
तो उनकी बहुत याद आती है
बहुत याद आती है

     

 
 
 

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