| |
शाख से टूट कर बाहों से छूट कर
गिर गई एक कली और हुई बेकदर
दोष झोकों का था, दम था उसमें भी कम
फिर तो होने लगे कैसे – कैसे सितम
जो भी गुजरे वहाँ सब रिझाने लगे
कोट की जेब में सब सजाने लगे
तब कली कह पड़ी कुछ तो वादे करो
है अगर प्रेम तो दिल की बाते करो
मजनूँ थे जो बने सब के सब डर गये
भवरें थे मनचले रूप से ही भर गये
तन्हाँ तब हो गई वह कली उस डगर
गिर गई एक कली……………………
रुप यौवन कभी भी न होते अमर
यूं प्रणय के लिए उम्र भर का सफर
प्यास बन रह गई ज़िंन्दगी की नदी
राधा सी हो गई प्रेम बिन ये सदी
औं धुआँ बन उड़ा नयनों का नीर तब |
सज गई याद की बन के तस्वीर तब
काग़जी फूल से बस बहलता है मन
शोहरते ज़िन्दगी का है अपना चलन
गीत बन रह गई वह कली उम्रभर
गिर गई एक कली……………………
भीड़ ही भीड़ बस पर न अपना कोई
टूटते दिल यहाँ जैसे सपना कोई
अनमनी नाचती रिश्तों की पुतलियाँ
हैं उम्मीदें बड़ी किसने क्या –क्या दिया
हैं सितमगर तो क्या यूं न घबराइये
आँधियाँ जब चले यूं न डगमगाइये
जब भी कोई गिरा उसको ठोकर लगी
खुद उठे गर कोई तो ही दुनिया सजी
इस तरह इक कली झेलती हैं कहर
गिर गई एक कली………………………। |