मुख्य पृष्ठ | परिचय | कविता | मुक्तक | मेरी कलम से | दिशा  (NGO)  | कृतियां | चित्र दीर्घा

स्नेह वाणी | प्रैस | संपर्क | प्रतिक्रिया | विशेष सूची मे जोड़े | मित्र को बतायें | Videos New

 

 
 

कली कथा (गीत)


 

  शाख से टूट कर बाहों से छूट कर
गिर गई एक कली और हुई बेकदर
दोष झोकों का था, दम था उसमें भी कम
फिर तो होने लगे कैसे – कैसे सितम
जो भी गुजरे वहाँ सब रिझाने लगे
कोट की जेब में सब सजाने लगे
तब कली कह पड़ी कुछ तो वादे करो
है अगर प्रेम तो दिल की बाते करो
मजनूँ थे जो बने सब के सब डर गये
भवरें थे मनचले रूप से ही भर गये
तन्हाँ तब हो गई वह कली उस डगर
गिर गई एक कली……………………

रुप यौवन कभी भी न होते अमर
यूं प्रणय के लिए उम्र भर का सफर
प्यास बन रह गई ज़िंन्दगी की नदी
राधा सी हो गई प्रेम बिन ये सदी
औं धुआँ बन उड़ा नयनों का नीर तब
सज गई याद की बन के तस्वीर तब
काग़जी फूल से बस बहलता है मन
शोहरते ज़िन्दगी का है अपना चलन
गीत बन रह गई वह कली उम्रभर
गिर गई एक कली……………………

भीड़ ही भीड़ बस पर न अपना कोई
टूटते दिल यहाँ जैसे सपना कोई
अनमनी नाचती रिश्तों की पुतलियाँ
हैं उम्मीदें बड़ी किसने क्या –क्या दिया
हैं सितमगर तो क्या यूं न घबराइये
आँधियाँ जब चले यूं न डगमगाइये
जब भी कोई गिरा उसको ठोकर लगी
खुद उठे गर कोई तो ही दुनिया सजी
इस तरह इक कली झेलती हैं कहर
गिर गई एक कली………………………।
     
 
 
 

कवितायें :

सरस्वती-वंदना | बेटियाँ | माँ | पिता घर |  एस॰एम॰एस॰ व ई मेल | तुम सिर्फ एक जुगनू हो | औरत

 
   

मैं तेरे नाम का अब भी दीया जलाती हूँ | जूही की कली सी याद | आजा ना, आजा ना, साजन जी घर आजा ना

रचने वाले कैसे तूने हमको रचाया है | इंतजार | प्रेम | नदी, सागर और वर्षा | इंसानियत की पैकिंग में शैतानियत

मेरा प्यार नदिया सा | आधे-अधूरे लोग | महिला आरक्षण | न्यूज़ चैनल की खबरें | दीदी | झांसी की रानी की प्रतिम

गीत-1 | गीत-2  | हिन्दी–वंदना | कली कथा | सावन उनसे जाके कहना रे | क्या दे त्यौहारों में

 

 

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2006 | RITUBASANT.COM 

Site by : ICS