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तुम सिर्फ एक जुगनू हो


 

 

तुम सिर्फ एक जुगनू हो

लौ नहीं जो राह दिखा सको

सूरज नहीं जो तम मिटा सको

सितारे नहीं जो अनवरत चमको

बिजली नहीं जो आवेश में दमको

तुम ज़िन्दगी की आंख मिचौनी हो

रात्रि का स्वप्न हो जो निंद्रा टूटते ही

ओझल हो जाये

वह प्रेमी हो जो प्रेमिका का सब

लूट कर खो जाये

वह मेनका हो जो विश्वामित्र को

इशारे पर नचाये

वह स्वर्ण मृग हो जिसे देख सीता

लक्ष्मण रेखा पार कर जाये

तुम मरीचिका हो जहां पानी का भ्रम है

राजा का रत्नजड़ित मुकुट हो जहां

मजदूर का श्रम है

तुम दरअसल अधूरा सत्य हो

स्वयं दिशा भ्रमित

अँधेरे को टटोलते मँडरा रहे हो

तुम्हारी दुम से निकलती रोशनी

आतिशबाजी से ज़्यादा कुछ भी नहीं

तुम मृगतृष्णा हों

जो संताप और छटपटाहट के

अलावा कुछ नहीं दे सकते

तुम मुट्ठी में रेत को पकडने की चेष्टा हो

अँधेरे में तीर चलाने जैसा प्रयास हो

एक बेवफा से प्रेम की आस हो

तुम एक रंगमंच हो

जो परदा बंद होते ही बेरंग हो जाता है

तो फिर

मैं तुम्हारा क्यूँ अनुसरण करूँ?

तुम जुगनू हो पलक झपकते ही खो जाओगे

और मैं फिर अँधेरे का सन्नाटा बन जाऊँगी

इसलिए

मैं अश्वत्थामा जैसे सत्य का शिकार

नहीं होना चाहती

मुझे एक सम्पूर्ण सत्य की तलाश है

जिसमें स्थायित्व हो, पूर्णता हो

जिसके सत्य होने पर भी सत्यता हो

इसी सत्य की तलाश में

मुझे अँधेरे से लड़ना है

कहीं दूर अकेले चलना है

तुम जुगनूओं के पीछे नहीं

मशाल बन खुद जलना है

     
 
 
 

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