मुख्य पृष्ठ | परिचय | कविता | मुक्तक | मेरी कलम से | दिशा  (NGO)  | कृतियां | चित्र दीर्घा

स्नेह वाणी | प्रैस | संपर्क | प्रतिक्रिया | विशेष सूची मे जोड़े | मित्र को बतायें | Videos New

 

 
 

इंसानियत की पैकिंग में शैतानियत


 

 

परत-दर-परत वह उतरता गया

प्याज के छिलकों की तरह

और

दर्द, आँसू, झुँझलाहट देता गया

मैं सोचती रही

इतने सुन्दर आवरण में

यह कैसा धोखा है

फिर समझ आया

बाज़ारीकरण के इस युग में

इंसानियत की पैकिंग में

शैतानियत है वह

और

मेरे आँसू अब तक ज़िन्दा संस्कृति है

जो वर्तमान सभ्यता पर झुँझला रहे हैं

 
     
 
 
 

कवितायें :

सरस्वती-वंदना | बेटियाँ | माँ | पिता घर |  एस॰एम॰एस॰ व ई मेल | तुम सिर्फ एक जुगनू हो | औरत

 
   

मैं तेरे नाम का अब भी दीया जलाती हूँ | जूही की कली सी याद | आजा ना, आजा ना, साजन जी घर आजा ना

रचने वाले कैसे तूने हमको रचाया है | इंतजार | प्रेम | नदी, सागर और वर्षा | इंसानियत की पैकिंग में शैतानियत

मेरा प्यार नदिया सा | आधे-अधूरे लोग

 

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2006 | RITUBASANT.COM 

Site by : ICS