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परत-दर-परत वह उतरता गया
प्याज के छिलकों की तरह
और
दर्द, आँसू, झुँझलाहट देता गया
मैं सोचती रही
इतने सुन्दर आवरण में
यह कैसा धोखा है
फिर समझ आया
बाज़ारीकरण के इस युग में
इंसानियत की पैकिंग में
शैतानियत है वह
और
मेरे आँसू अब तक ज़िन्दा संस्कृति है
जो वर्तमान सभ्यता पर झुँझला रहे हैं |