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हिन्दी – वंदना


 

  कल – कल बह कर भाषाओं की सारी नदियाँ
मिल कर एक विशाल समन्दर बन जाती है
यहीं समन्दर बादल बन जब छा जाता है
मिट्टी से सौंधी – सौंधी खुश्बु आती है
इस खुश्बु से सबका मन हो जाता चंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वंदन

जिसमें चूड़ी – कंगना आपस में बतियायें
जिसमें कुमकुम – बिंदिया माथे को चमकायें
दुल्हन सिमट – सिमट कर जिसमें शरमाती हो
हल्दी माहवर, मेंहदी जिसमें रंग लाती हो
स्वयं सुहागन करती हो रण का अभिनन्दन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वंदन
जिस भाषा में माँ चूल्हे को लेपा करती
जिस भाषा में घुरड़ - घुरड़ कर चक्की चलती
जिसमें आँगन से दूजा आँगन बतियाता
बूढ़ा बरगद जिस भाषा में पास बुलाता
इक घर का दुख जब घर – घर का हो जाता क्रंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वंदन
 
     
 
 
 

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