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बाहर से सब हरा, भीतर से बदरंग
एक सूखी डाल चल रही तने के संग
बढ़ रही तने के संग…………………
इक घोंसला बना लिया पक्षी ने डाल पर
छोड़ कहाँ जाये उन्हें, उनके हाल पर
नन्हें हैं पंख हौसला कहाँ से लायेंगे
डाल ही बिखर गई तो उड़ न पायेंगे
बाहों में उनको इसलिये वो झुला रही
माली से मिले जख्म भी हँस कर भुला रही
पीला पड़ा है गात पर कर रही है जंग
एक सूखी डाल बढ़ रही………………
ओंरों सी हरी न हुई सावन के मास में
प्यासी ही रही बूंद को स्वाति की आस में |
पत्ता – पत्ता बूटा – बूटा सब बिखर गये
तन की लाली मन का हरापन वो हर गये
पर अंत तक जुड़ी रही तने के प्यार में
श्रृंगार था जिसने किया उसके आभार में
जब तलक है सांस तब तलक रहेगी तंग
बढ़ रही तने के संग……………………
जर्रा – जर्रा दर्द का लहू वो पी रही
हरे – भरे पेड़ का भ्रम ही जी रही
खुद सुखती रही वो प्रेम के अभाव में
कोई लेप न उसको मिला रिसते घाव में
ये साथ है तो ये भला कोई न साथ हो
जहां मुश्किलों में अपनेपन का न हाथ हो
कोई साथ यूं भी देख संग जिंन्दगी है दंग
बढ़ रही तने के संग……………………… |