मुख्य पृष्ठ | परिचय | कविता | मुक्तक | मेरी कलम से | दिशा  (NGO)  | कृतियां | चित्र दीर्घा

स्नेह वाणी | प्रैस | संपर्क | प्रतिक्रिया | विशेष सूची मे जोड़े | मित्र को बतायें | Videos New

 

 
 

गीत


 

  बाहर से सब हरा, भीतर से बदरंग
एक सूखी डाल चल रही तने के संग
बढ़ रही तने के संग…………………

इक घोंसला बना लिया पक्षी ने डाल पर
छोड़ कहाँ जाये उन्हें, उनके हाल पर
नन्हें हैं पंख हौसला कहाँ से लायेंगे
डाल ही बिखर गई तो उड़ न पायेंगे
बाहों में उनको इसलिये वो झुला रही
माली से मिले जख्म भी हँस कर भुला रही
पीला पड़ा है गात पर कर रही है जंग
एक सूखी डाल बढ़ रही………………

ओंरों सी हरी न हुई सावन के मास में
प्यासी ही रही बूंद को स्वाति की आस में

पत्ता – पत्ता बूटा – बूटा सब बिखर गये
तन की लाली मन का हरापन वो हर गये

पर अंत तक जुड़ी रही तने के प्यार में
श्रृंगार था जिसने किया उसके आभार में
जब तलक है सांस तब तलक रहेगी तंग
बढ़ रही तने के संग……………………

 

जर्रा – जर्रा दर्द का लहू वो पी रही
हरे – भरे पेड़ का भ्रम ही जी रही
खुद सुखती रही वो प्रेम के अभाव में
कोई लेप न उसको मिला रिसते घाव में
ये साथ है तो ये भला कोई न साथ हो
जहां मुश्किलों में अपनेपन का न हाथ हो
कोई साथ यूं भी देख संग जिंन्दगी है दंग
बढ़ रही तने के संग………………………

     
 
 
 

कवितायें :

सरस्वती-वंदना | बेटियाँ | माँ | पिता घर |  एस॰एम॰एस॰ व ई मेल | तुम सिर्फ एक जुगनू हो | औरत

 
   

मैं तेरे नाम का अब भी दीया जलाती हूँ | जूही की कली सी याद | आजा ना, आजा ना, साजन जी घर आजा ना

रचने वाले कैसे तूने हमको रचाया है | इंतजार | प्रेम | नदी, सागर और वर्षा | इंसानियत की पैकिंग में शैतानियत

मेरा प्यार नदिया सा | आधे-अधूरे लोग | महिला आरक्षण | न्यूज़ चैनल की खबरें | दीदी | झांसी की रानी की प्रतिम

गीत-1 | गीत-2  | हिन्दी–वंदना | कली कथा | सावन उनसे जाके कहना रे | क्या दे त्यौहारों में

 

 

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2006 | RITUBASANT.COM 

Site by : ICS