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गीत
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अपनेपन की गंध से कैसी दुर्गंध आई
हाय हमदम ही मेरा बन गया हरजाई
अपनेपन की गंध से…………………
जिन आँखो में हरदम दिखी, बस मेरी तस्वीर थी
मेरी खातिर थी खुशी, मेरी खातिर पीर थी
आज उन नज़रों ने ही मुझसे नज़रे चुराई
अपनेपन की गंध से…………………
ना अधर में वो तपन है, ना मिलन की प्यास है
मौन काजल पूछता अब क्यूं छला विश्वास है
तन के खोलूँ पट मगर मन को बहला न पाई
अपनेपन की गंध से…………………
प्यार की उष्मा अचानक हो गई तेज ज्वर
अब छुअन में वो दवा सा न रहा कोई असर
खारे जल ने क्या किसी प्यासे की प्यास बुझाई
अपनेपन की गंध से………………… |
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