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ताउम्र
दीदी के चेहरे पर कभी नहीं
दिखती थी हंसी
शायद ही देखी हो उन्होंने
कभी कोई खुशी
पर
जब भी मैं उनसे मिलती
या फोन पर बात करती
मुझे अवश्य हिदायत देतीं
चिंता मत करना ‘खुश रहा करो’
उदास मत होना ‘हंसती रहा करो’
जब भी मन उदास हो
या मन में कोई बात हो
मुझसे सब कह लेना
मन हल्का हो जायेगा
इस तरह
अपनी बची खुची हिम्मत भी
मुझमें भर देतीं थी वे
जानें प्यार भरी बातों से कैसा
जादू कर देतीं थी वे
इसीलिए मेरा अभ्यस्त मन |
अब भी फोन बुक में
दीदी के नाम से सेव उनका
नंबर मैं जब तब मिला देती हूं
और दीदी
सिर्फ मुझे खुश करने, हौसला भरने
फोन स्वर्ग लोक से भी
उठा लिया करतीं हैं
और यह शाश्वत सत्य और भी सत्य हो जाता है
कि दो बहनें हमेशा निस्वार्थ अपना सुख दुख
बाँटा करतीं हैं
एक दूज़े के घांव भरती हैं
हाँ बेशक अब दीदी नहीं हैं
पर हम घंटों बतियाते हैं
फर्क बस इतना है
पहले हम दोनों के पते अलग थे
फोन नंबर अलग थे
किन्तु अब हम एक हैं
वे मुझमें
और
मैं उनमें
जी रही हूं |