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खामोशी अगर मेरी भाषा है
और तुम्हारी चिल्लाना
तो ये न समझना कि
मेरे जज़्बात
मेरा वजूद
मेरा अन्तस भी खामोश है
मैं खामोश हूँ इसलिए कि तुम चिल्ला सको
मैंने भी अगर तुम्हारी भाषा सीख ली
तो आदम और हौवा की इस
सुन्दर सृष्टि का क्या होगा
क्या होगा इस प्रकृति का
जिसकी अपनी नियति है
मैं इस सृष्टि की नियति में
व्यवधान नहीं बनना चाहती |
औरत हूँ सृजन मेरा धर्म है, विध्वंस नहीं
इसलिए अपना धर्म निभा रही हूँ
खामोश हूँ
इसलिए नहीं कि मैं हारी हूँ
एक कमजोर अबला नारी हूँ
मैं शक्ति हूँ, हुँकारना मुझे भी आता है
पर सच कहूँ, न जाने क्यूं
मुझे तुमसे हारना भी भाता है
बस
यहीं फर्क है मुझमें और तुममें
मैं जीत कर भी सदा हार जाती हूँ
और तुम हार कर भी ज़ीत जाते हो
शायद इसलिए
मैं आखिर औरत और तुम
आखिर मर्द ही रह जाते हो |